1984 दंगों की पीड़िता ने सुनाई पीड़ा, घर के फर्नीचर से पिता-बेटे का किया दाह संस्कार
34 साल बहुत लंबा समय होता है। मेरी आंखों से अब आंसू भी सूख चुके हैं। वो दिन मुझे आज भी याद है जब मुझे अपने पति और बेटे के दाह संस्कार की व्यवस्था भी नहीं की। उन्होंने अपने पति और बेटे का दाह संस्कार घर के फर्नीचर के जरिए किया था।
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